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22 Sept, 05:42
इस यात्रा की शुरुआत 1989 में शांतिनिकेतन में हुई थी। उस समय केतकी रवींद्रनाथ की कविताओं का अँग्रेजी में अनुवाद कर रही थीं। इसी दौरान एक दिन उनकी मुलाकात नेत्र-विशेषज्ञ डॉ. ज्योतिर्मय बसु से हुई। उन्होंने केतकी को आर. डब्ल्यू. पिकफ़ोर्ड के साथ संयुक्त रूप से लिखे गए एक शोधपत्र को पढ़ने के लिए दिया। उस शोधपत्र में रवींद्रनाथ के कलर-विज़न और उनके चित्रों से जुड़ी सौंदर्यात्मक समस्याओं पर चर्चा की गई थी। यहीं पहली बार केतकी के सामने एक महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट रूप से उभरकर आई, संभवतः रवींद्रनाथ में प्रोटैनोपिया [Protanopia] अर्थात् लाल रंग से संबंधित एक विशेष प्रकार की कलर-विज़न-डेफ़िशिएंसी थी।• बेबी शॉ(https://hindwi.org//bela/c-o-bengal-ketaki-kushari-dyson-ke-rabindranath-baby-shaw)#Hindwibela #babyshaw #ravindranathtagore #ketkikusharidyson #cobengal


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21 Sept, 12:28
भाग्य रेखाओं में तुम कहीं भी न थे प्राण के पार लेकिन तुम्हीं दीखतेसाँस के युद्ध में मन पराजित हुआ याद की अब कोई राजधानी नहीं प्रेम तो जन्म से ही प्रणयहीन है बात लेकिन कभी हमने मानी नहींहर नए युग तुम्हारी प्रतीक्षा रही हर घड़ी हम समय से अधिक बीतते• अमन अक्षर#hindwi #amanakshar #geet #bhagyarekha #amanakshargeet


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21 Sept, 09:23
शायद कोई मशीन हमें कभी ऐसा आख़िरी जवाब न दे पाए, जिससे हर इंसान समझ जाए कि उसे क्यों जीना चाहिए! फिर भी हम प्रेम कर सकते हैं, फ़ैसले ले सकते हैं, कुछ नया बना सकते हैं और एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। और अगर किसी दिन कोई मशीन हमारे हर सवाल का जवाब दे भी दे, तब भी यह तय करना हमारे हिस्से में रहेगा कि हमें अपनी ज़िंदगी कैसे जीनी है।• मनीष वर्मा(https://hindwi.org/bela/gyaan-abhigyaan-aakhiri-sawaal-brahmaand-ka-antim-ant-manish-verma)#Hindwibela #manishverma #love #relationships #life


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20 Sept, 11:33edited
रील का क्या है! ‘हिन्दवी’ ने एक कॉलम घोषित किया था : ‘रीलमरील’। इसे जिन्हें लिखना था, वह लिख नहीं पाए। इसके बावजूद समय-समय पर इस कॉलम के अंतर्गत तीन लेख आए, जिनमें से एक मैंने भी लिखा। फिर यह कॉलम स्थगित रहा। इसके बाद हाल ही में ‘हिन्दवी’ के संपादक-मंडल ने तय किया और मुझे सूचित कि इस कॉलम को री-डिफ़ाइन किया जा रहा है और अब इसका नाम होगा : ‘रील रसाचार्य’! ‘रील’ के आगे ‘रस’ तक तो ठीक था, लेकिन ‘आचार्य’ जैसा शब्द आते-आते मैं थोड़ा चौंका, हालाँकि चौंकने वाली सूचना इसके आगे थी कि यह कॉलम मुझे लिखना है और वह भी साप्ताहिक!• रचित(https://hindwi.org//bela/reel-rasacharya-maati-ko-putra-kaise-nachat-hai-rachit)#Hindwibela #reelrasaacharya #viralreel #tiktok #puneetsuperstar


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20 Sept, 05:09
कुछ चीज़ें चली नहीं जातीं। वे बस अपनी जगह से हटती हैं और अपने पीछे एक ऐसी अनुपस्थिति छोड़ जाती हैं, जो हर दिन दिखाई देती है। रिया ने तस्वीर को सीने से लगा लिया। उसकी आँखें बंद हो गईं। कमरे में अब कोई आवाज़ नहीं थी। सिर्फ़ दीवार पर बचा हुआ वह निशान था... और उसके भीतर... कुछ रह गया!• उम्मे हबीबा(https://hindwi.org/bela/kahani-kuchh-rah-gaya-umme-habiba)#Hindwibela #kathasaptah #kathasahitya #ummehabiba


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19 Sept, 10:39
प्रेम की एक कोमलता इस में भी है कि हम किसी दूसरे मनुष्य की छोटी-सी असुविधा के निवारण को भी अपने लिए महत्त्वपूर्ण मानने लगते हैं। संगी के लिए खाना बनाना साथ-साथ एक ऐसा घर बनाने की कल्पना है; जहाँ प्रेम किसी बड़ी बात की तरह नहीं, रोज़ की छोटी-छोटी आदतों की तरह मौजूद रहे।• शायक आलोक(https://hindwi.org//bela/shanivaarer-chithi-cheezen-aur-cheezen-shayak-alok)#Hindwibela #shayakalok #shanivaarerchitthi #love #prem


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19 Sept, 05:25edited
मैं नींद में था। नीली आँखों वाला एक चेहरा मेरे सामने आता और फिर ग़ायब हो जाता। फिर रोटी बना रही एक स्त्री का चित्र आता और ग़ायब हो जाता। धीरे-धीरे चित्र कुछ स्पष्ट होने लगते हैं।लिली मेरे पीछे-पीछे आ रही है। मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया है और उसकी नीली आँखों को चूम रहा हूँ। मैं क्या देखता हूँ कि लिली का चेहरा पूरी तरह से तप रहा है। वह धीरे-धीरे अपना होश खो रही है...• आशीष कुमार शाह(https://hindwi.org/bela/kahani-neeli-ashish-kumar-shah)#Hindwibela कथा-सप्ताह #kathasaptah #kathasahitya #ashishkumarshah


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18 Sept, 12:40
उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं के मौन संघर्ष, अकेलेपन और साहस की कहानी कहती स्वतंत्र फ़िल्म ‘डॉटर ऑफ़ द माउंटेन्स’ (Daughter of the Mountains) को ‘इंडियन इंडिपेंडेंट फ़िल्म फ़ेस्टिवल, कोलकाता’ में अवॉर्ड विनर के रूप में सम्मानित किया गया है। फ़िल्म के लेखक, निर्देशक और निर्माता मुकेश पांडेय हैं।फ़िल्म पहाड़ के उस यथार्थ को सामने लाती है, जहाँ रोज़गार की तलाश में पुरुष दिल्ली और दूसरे मैदानी इलाक़ों की ओर चले जाते हैं और पीछे रह जाती हैं स्त्रियाँ—घर, खेत, पशु, बच्चों और तमाम ज़िम्मेदारियों के साथ। उनके हिस्से में आता है एक लंबा इंतिज़ार और ऐसा अकेलापन, जिसकी कोई सार्वजनिक कथा नहीं बनती।(https://hindwi.org//bela/mukesh-pandey-ki-film-daughter-of-the-mountains-ko-indian-independent-film-festival-mein-samman)#Hindwibela #pankajprakhar #mukeshpandey #daughterofthemountains #film


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18 Sept, 09:53
आप कहते हैं : “यह युवा रचनाकार पीढ़ी सोशल मीडिया की पैदाइश है। मुझे लगता है कि वह स्वयंभू महान् पीढ़ी है। इनमें से ज़्यादातर के पास अपने पूर्वज-लेखकों के पाठ की या सम्मान की कोई जगह नहीं है।” माफ़ कीजिएगा, आपका यह कहना भी कहानी में ‘जेन-ज़ी’ के लिए व्यक्त स्टीरियोटाइप सरलीकरण की तरह ही है। हो सके तो खुले मन और नए सिरे से नई पीढ़ी को समझने की कोशिश कीजिए, एक लेखक और मनुष्य के तौर पर निश्चित ही आप बेहतर और समृद्ध होंगे। तब नई पीढ़ी भी आपके कहे में कुंठा नहीं, संवाद के सूत्र तलाशेगी।• राकेश बिहारी(https://hindwi.org//bela/chahta-to-bach-sakta-tha-gen-z-ka-tota-wale-anand-harshul-ke-naam-rakesh-bihari-ka-patra)#Hindwibela #pankajprakhar #letter #vivad #genz


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18 Sept, 06:43
“सरसरी तुम जहान से गुज़रे वर्ना हर जा जहान-ए-दीगर था”मीर के इस शे’र की रौशनी में ‘सरसरी’—‘हिन्दवी बेला’ पर ‘लिमिटेड सीरीज़’ का नया स्तंभ है। इसमें एक नई सभ्यता-समीक्षा के दर्शन होंगे।इस स्तंभ की शुरुआत : हाल ही में हुए हिंदी के एक उत्सव के बहाने उत्सवालू हुई जनसंख्या पर...(https://hindwi.org//bela/sarsari-hindi-ka-utsav-aur-andhkaar-pankaj-prakhar)#Hindwibela #pankajprakhar #sarsari #jaipur #hindiutsav


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18 Sept, 05:20edited
सुनीता को हमेशा ही अपने मोटे हो जाने का भय सताया करता है। कहती है, मोटापा दरअसल बीमारियों का घर होता है। इसलिए रोज़ सुबह योग और रात के खाने के बाद आधे घंटे वॉक करना उसके जीवन का नियम रहा है। खाना भी बेहद संतुलित खाती है। फ़ूड-साइंस का ख़ूब ज्ञान है सुनीता को। कोई पूछे तो सादगी से कहती है, “सामान्य समझ की बात है।”• प्रियंका ओम(https://hindwi.org/bela/kahani-kya-sach-kya-jhoot-priyanka-om)#Hindwibela कथा-सप्ताह #kathasaptah #priyankaom #kathasahitya


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17 Sept, 09:33
‘अनफ़्रेम्ड’—‘हिन्दवी बेला’ पर नया स्तंभ है। इसमें अदब, सिनेमा, शहर, समाज और बदलती जीवन-शैली के उन रंगों को देखने की कोशिश रहेगी; जो अक्सर तय खाँचों और बँधी-बँधाई दृष्टि के बाहर रह जाते हैं।इस स्तंभ की शुरुआत : हाल ही में वायरल हुए अस्सी के ट्रेंड के बहाने...अब से प्रत्येक गुरुवार—‘अनफ़्रेम्ड’... क्योंकि दुनिया सिर्फ़ उतनी नहीं, जितनी फ़्रेम में दिखाई देती है।(https://hindwi.org//bela/unframed-ai-se-pare-hanfta-vo-asal-assi-dinesh-shrinet)#Hindwibela #unframed #dineshshrinet #80sstyle #viraltrend


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17 Sept, 05:21edited
अब एक दूसरी बात बताने जा रहा हूँ। लेकिन यह बात बहुत सीरियस है, इसलिए ध्यान से सुनिएगा। इस दिन पहली बार मेरी मुलाक़ात श्री श्री १००८ भयंकर पांडे सुरसुरी से हुई। यही हैं मेरे गुरुजी। कुछ ही दिनों पहले गुरुजी की लदोन्नति खिल्ली विनाशालय में हुई थी, इससे पहले वह बधारस चिंदू विनाशालय में सहायक सड़ीक्षक थे। मेरा समर्पण देखकर एक दिन गुरुजी ने मुझे पर्सनली भरी क्लास बताया, “देखो बेटा, समाज में एक सिस्टम का होना बहुत ज़रूरी है और सिस्टम बनता है संस्कारों से। खिल्ली विनाशालय में सड़ने आए आप युवजन ही इस देश का भविष्य हैं। देश का भविष्य अगर बचाना है और फिर अगर बेचना है तो हमें आपको सड़ना होगा और ख़ूब सड़कर अपने देश के सिस्टम की रक्षा करनी होगी। मगर सिस्टम को बचाने से पहले हमें वो बचाना होगा।”• आयुष पांडेय(https://hindwi.org/bela/kahani-khilli-vinashalaya-ayush-pandey)#Hindwibela #university #campuslife कथा-सप्ताह #kathasaptah


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16 Sept, 07:03
‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ की कहानी या फिर कथ्य बस इतना-सा ही है कि अपराध की बुनियाद पर खड़ी हुई व्यापार की ज़मीन अब राजनीतिक वर्चस्व की धुरी बन चुकी है, वर्चस्व जातीय टकराव और क्षेत्रीय पहचान से होते हुए हिंदी पट्टी के तीसरी श्रेणी के शहरों की गलियों में हिंसा और स्त्रियों के वस्तुकरण का औज़ार बनते-बनते और गली-मोहल्लों में नशा बाँटते हुए हिंदी पट्टी के सामंतीय वर्चस्व के विस्तार को पूर्वांचल, बिहार से खींचते हुए राजस्थान तक ला पटकता है।• अभिषेक कुमार सिंह(https://hindwi.org/bela/mirzapur-kahaniheen-antaheen-cinema-abhishek-kumar-singh)#Hindwibela #mirzapur #guddubhaiya #mirzpur #munnabhaiya


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16 Sept, 05:11edited
आज वाक़ई सोमेश उर्फ़ बल्ले भंडारी का इम्तिहान था। शाम के संधिकाल की रोशनी में वह चौथी कैवेंडर सुलगाकर गश्ती के इंतज़ार में लग गया। थिएटर से भीड़ निकलने का भी यह वक़्त था। इस भीड़ को उसकी निगाह भेदती जा रही थी। गश्ती जैसी शक्ल तो कहीं थी ही नहीं। बला की ख़ूबसूरत, ख़ुशबूदार लड़कियाँ थीं, या गजरे से सजी एकदम घरेलू औरतें। उसे लगा कि गश्ती बाईचांस ही मिलती होगी। मन किया कि एक बार निशू भाई को बोलकर कह दे कि ‘गुरु तू अपना मंतर दिखा। मुझ अनाड़ी से ना होगा यह।’• प्रमोद द्विवेदी(https://hindwi.org/bela/kahani-gashti-pramod-dwivedi)#Hindwibela #kathasptah #pramodwivedi #GASHTI #townstory


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15 Sept, 06:11edited
बंगाल बदल रहा है। उसकी राजनीति और सामाजिकता भी बदल रही है। इस बदलाव में आज के बंगाल की सांस्कृतिक चेतना और राजनीतिक व्याकुलताओं की जड़ें उन कहानियों, बहसों, व्यक्तियों और घटनाओं में हैं; जिन्होंने पहले भी कभी बंगाल को बदला या कहें बदलना शुरू किया था।‘हिन्दवी बेला’ पर ‘C/O बंगाल’ इस पड़ताल का एक साप्ताहिक सिलसिला है। यह बंगाल के उस विन्यास तक लौटने की कोशिश है जहाँ किसी पाड़ा, किसी बोनेदी बाड़ी के बैठकख़ाने या भद्रलोक के किसी आड्डे में नवजागरण की चेतना आकार ले रही थी। आगे यही चेतना औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिरोध, स्वदेशी और गणांदोलनों की धाराओं में दिखाई दी।बहरहाल, इस स्तंभ में सिर्फ़ अतीत की याद नहीं, उसके प्रकाश में वर्तमान का पाठ भी है।इस सफ़र की शुरुआत शरतचंद्र से, जिनके जन्म के आज 150 वर्ष पूरे हो गए हैं।अब से प्रत्येक मंगलवार—‘C/O बंगाल’(https://hindwi.org/bela/c-o-bengal-sarat-chandra-chattopadhyay-ke-din-baby-shaw)#Hindwibela #sharatchandra #babyshaw #bengal #kolkata


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15 Sept, 05:28edited
डायनासोर जैसे दिखने वाले भारी-भरकम एक्रिडोथेरेस शब्द से आप लोग घबराइए नहीं, हर सरल को जटिल बनाकर कहना यहाँ कूल माना जाता है। यह परिचित मैना का वैज्ञानिक नाम है।• निधि अग्रवाल(https://hindwi.org/bela/kahani-project-acridotheres-default-setting-happiness-nidhi-agrawal)#Hindwibela #nidhiagarwal #women #kathasptah


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14 Sept, 04:55edited
ऑफ़िस में कंप्यूटर के आगे बैठा उत्कर्ष, कमिटी रेकमेंडेशन की फ़ाइल को ट्रैक कर रहा है। बॉस ने अभी फ़ाइल खोलकर नहीं देखी है। इसके पहले कि वह फ़ाइल देख ले, फ़ाइल को पुल-बैक किया जा सकता था। उसने बिना किसी देरी के फ़ाइल पुल-बैक कर ली है। जल्दी से रीसाइकिल बिन में जाकर उसने शाम को डिलीट किए डिसेंट नोट की फ़ाइल को रीस्टोर कर लिया है। उसकी साँस जैसे अपनी पुरानी लय में लौटने लगी है... अब वह कमिटी रेकमेंडेशन पर लिखे ‘सहमत’ को डिलीट कर रहा है और अगले ही पल उसने डिसेंट नोट को कॉपी करके जस का तस वहाँ पेस्ट कर दिया है। ऑफ़िस की मेज़ अचानक से कन्वेयर बेल्ट में बदल गई है।• राकेश बिहारी(https://hindwi.org/bela/kahani-sorry-you-are-not-registered-rakesh-bihari)#Hindwibela #rakeshbihari #officelife


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14 Sept, 04:01



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13 Sept, 03:44
यह सुदीर्घ साक्षात्कार गए बीस दिनों के बीच मुमकिन हुआ है। इसकी नींव में दो दिन और एक आवागमन [काशी से प्रयाग—प्रयाग से काशी] है। यह संवाद इसलिए बेहद दुर्लभ है कि यह हिंदी की सबसे वरिष्ठ और समादृत पीढ़ी के एक कवि से हिंदी की सबसे नई और प्रतिभामय पीढ़ी के एक कवि का संवाद है। एक सीमित अवधि के लिए सुलभ हुई इस गतिशीलता में कवि के व्यक्तित्व और कवित्व के समग्र आयाम आ सके हैं; यह कहना कुछ ज़्यादा होगा, लेकिन यह ज़रूर कह सकते हैं कि इसमें ज्ञानेंद्रपति की कविता की पार्श्वभूमि कुछ प्रकट-स्पष्ट हुई है। इससे इतर इस संवाद को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि यह हिंदी में पॉडकास्ट के नॉन-सीरियस विन्यास और टेक्स्ट में रूढ़ व्यवहार से इतर संवाद की एक नवीन शैली और भाषा का मानकीकरण करने का एक विनययुक्त यत्न है। कुछ वाक्य, शब्द, संज्ञाएँ, पद और विशेषण कैसे बरतने हैं; इस संवाद से गुज़रकर समझा-सीखा जा सकता है।(https://hindwi.org/bela/gyanendrapati-se-kushagra-adwaita-ki-baatcheet-kuch-kaha-kuch-rah-gaya)#Hindwibela

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